अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ।। गीता 9/22।। अर्थ : जो भक्तजन अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मुझे पूजते हैं, ऐसे नित्ययुक्त साधकों के योगक्षेम को मैं स्वयं वहन करता हूं। भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए योग क्षेम के महत्व को बता रहे हैं जो भक्त एकनिष्ठ हो करके मेरे चिंतन में लीन रहता है उस भक्त की चिंता उसको किस वस्तु की आवश्यकता है परमात्मा स्वयं करते हैं। वास्तव में भक्ति वह गुण होता है भक्ति वह भाव होता है भक्ति वह तेज होता है जो आपको परमात्मा से जोड़ देता है ।जब आप उसके चिंतन में अनन्य भाव से लीन रहते हो तो परमात्मा आपकी कामनाओं आवश्यकताएं की पूर्ति स्वयं करते है। वास्तव में यह श्लोक परमात्मा के चिंतन मनन की महत्ता को बताता है। इसी बात को यदि ज्योतिष की भाषा में कहें तो सनी आध्यात्म वैराग्य मीमांसा न्याय का कारक होता है यदि शुभ स्थिति में होता है तो व्यक्ति को दार्शनिक तपस्वी भी बना देता है गुरु धर्म ज्ञान मर्यादा विवेक न्याय परंपरा महानता विशाल उपदेश कर्म कांड का कारक होता है संहिता और धैर्य उसमें विद्यमान होता है जब शनि गुरु के साथ मिल जाता है तो जीवन में धर्म वैराग्य के साथ व्यक्ति में ईश्वर के प्रति भक्ति आ जाती है ।व्यक्ति ईश्वर को मानने वाला हो जाता है ।चंद्रमा मन का कारक होता है सभी प्रकार की कल्पनाएं भावनाएं भोजन वनस्पति जल का कारक होता है जब चंद्रमा गुरु और शनि के सानिध्य में आता है तो मन धर्म अध्यात्म इष्ट के प्रति समर्पित हो जाता है । उसकी धुन उसकी हर सांस में राम बसने लगते हैं। परमात्मा में मन रम जाता हैं। केतु विश्वास वफादारी आस्था श्रद्धा सन्यास मोक्ष जनसेवा पशु सेवा अध्यात्म अंत: प्रेरणा वरदान शाप प्रकट होना अंतर्ध्यान होना का कारक होता है। वशिष्ठ ऋषि ने और अगस्त्य ऋषि ने केतु को प्रजापति माना है। जब शनि चंद्र गुरु केतु द्वादश भाव में मोक्ष त्रिकोण में स्थित होते हैं तो व्यक्ति का चिंतन परमात्मा के श्री चरणों में होता है वह अनन्य भाव से नित्य चिंतन परमात्मा पर करता है परमात्मा उसकी समस्त आवश्यकता ओं का ध्यान रखते हैं। भक्त के पैर में गर्मी भी लग रही है पैर जल रहे हैं कष्ट भक्त के भगवान को होने लगता है भगवान सद्य: उसकी समस्त कामनाओं की पूर्ति करते हैं ।भक्त भी भगवान का चिंतन करते करते देवत्व को प्राप्त हो जाता है और शिवोहम शिवोहम करते हुए आनंद से भर जाता है अपनी मोक्ष यात्रा में शनि चंद्र गुरु केतु के कारण नाद ब्रह्म की प्राप्ति करते हुए परम तत्व के श्री चरणों में विलीन हो जाता है। तुम बोलो कागज की लेखी मैं बोलूं आखिन की देखी ।
आचार्य Dr N.D. Dixit Nadi expert and Nadi Teacher 6307437516 ‘ 9628333618